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अनुवाद के बिना विश्व गूंगा है : प्रो. पूरन चंद टंडन


मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पंडित मदनमोहन मालवीय राष्ट्रीय शिक्षक एवं शिक्षण मिशन, शिक्षण अध्ययन केंद्र, रामानुजन कॉलेज, श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय,आरमापुर पी.जी. कॉलेज, कानपुर और माउंट कार्मेल कॉलेज, बेंगलुरु के संयुक्त तत्वावधान में पाक्षिक संकाय समवर्धन कार्यक्रम के दसवें दिन के प्रथम सत्र में पुस्तकालय कार्यक्रम का आयोजन हुआ । कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में सागर (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) के हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ए.डी शर्मा  जी आमंत्रित रहे । उन्होंने 'वैचारिक स्वराज और भाषायी राजपथ : भाषिक राष्ट्रवाद के अर्थ संदर्भ' विषय पर रोचक एवं सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया। बेहद महत्वपूर्ण उद्धरणों एवं प्रसंगों के साथ उन्होंने लिंग्विस्टिक नेशनलिज्म, ओरेंटलिज्म और वामपंथ को साथ लेकर भाषाई समस्याओं को उजागर किया। उन्होंने बताया कि हिंदी साहित्य के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषाई एकता को लेकर कितने सजग थे तथा किस तरह वे परम्परा को भाषा से संबद्ध करते हुए साहित्यिक दुनिया से ऊपर उठकर विचार विमर्श करते थे। प्रो. ए डी शर्मा ने अन्य भाषाओं से हिंदी भाषा के संबंध पर अपनी बात रखी एवं कहा कि अगर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए तो वह कोई ऐसी भाषा ऐसी नहीं है जो अन्य भाषाओं को छोड़ देगी तथा उनका अपकर्ष होगा बल्कि हिंदी तो वह कड़ी है जिससे बाकी सभी भाषाएं पोषित और पल्लवित होंगी। हिंदी एकता और अखंडता की भाषा है। भारत की अक्षणुता को बरकरार रखने के लिए हिंदी को सिर्फ संपर्क ही नहीं अपितु मुख्यधारा की भाषाओं के साथ मिलकर आगे आने की आवश्यकता है। प्रो. ए डी शर्मा ने दर्शन को हिंदी से जोड़ते हुए न सिर्फ विश्लेषित व्यख्यायान दिया बल्कि भाषिक राष्ट्रवाद पर जोर देते हुए स्वातंत्र्योत्तर घटनाओं को भी सामने रखा जिससे हिंदी की वैचारिक पृष्ठभूमि साफ हुई। 


डॉ.कोयल विश्वास ने इस सत्र का संचालन किया।
तृतीय सत्र में साहित्य,भाषा,समाज और दर्शन में अनुवाद की उपादेयता विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर पूरन चन्द टंडन को वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया गया था।उन्होंने इस संकाय संवर्धन कार्यक्रम के विषय की तारीफ़ करते हुए अपनी बात की।उन्होंने बताया कि वसुधैव कुटुंबकम का सूत्र भावना व संबंध है जबकि भूमंडलीकरण का सूत्र बाज़ारवाद एवं धन है। उन्होंने बताया कि किस तरीक़े से आज अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेलों का जो केंद्रीय भाव है उसके केंद्र में अनुवाद विद्यमान् हो चुका है परंतु अनुवाद के साथ वर्षों से हुए सौतेले व्यवहार पर उन्होंने चिंता ज़ाहिर की।उन्होंने कहा कि आधुनिकीकरण केवल हमारा यह हमारे समाज का ही नहीं होता अभी तो हमारी भाषाओं का भी होता है। उन्होने अनुवाद के बारे में बताया कि किस तरीक़े से अनुवाद केवल दो भाषाओं के ज्ञान का खेल नहीं है अपितु इसके लिए विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है जो अनुवाद की बारीकियों को पढ़ने के बाद ही आ सकता है। उन्होंने बताया कि यदि अनुवाद नहीं होता तो आज हम विश्व की श्रेष्ठ कृतियों से परिचित न हो पाते।उन्होंने कहा कि भारत का जो अहिंसा का दर्शन है या अन्य भारत के दर्शन विश्व में इसलिए थोड़ी देर से पहुँचे क्योंकि हिन्दी भाषा से अन्य भाषाओं में अनुवाद की शुरुआत की प्रक्रिया थोड़ी देर से शुरू हुई। इसके पश्चात उन्होंने अनुवाद की प्रासंगिकता व इसके विविध आयामों पर विस्तार से चर्चा की और उन्होंने बताया कि किस तरीक़े से अनुवाद भाषा को संरक्षण देता है। संकाय संवर्धन कार्यक्रम के संयोजक डॉ. आलोक रंजन पांडेय इस सत्र का संचालन कर रहे थे एवं डॉ. शिवानी जार्ज ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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